असंस्कार

संस्कारविहीन अवस्था असंस्कार है। इसमें न कुसंस्कार होते हैं और न सुसंस्कार अर्थात्‌ जिसमें संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं होती है, वे असंस्कार कहलाते हैं ।

>असंस्कार सरल शब्दों में

जिस प्रकार असंस्कारित सब्जी, गेहूँ, दाल, चावल आदि शक्षुधा शान्त करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं और यदि उनको बनाते समय सही विधि एवं सामग्रियों से संस्कारित कर दिया जावे तो वे स्वादिष्ट तथा मनभावन तुष्टिदायक बन जाते हैं , उसी प्रकार जो व्यक्ति अपने जीवन के बारे में कुछ भी नहीं जानता; जहाँ-कहीं , जो कुछ भी क्रियाएँ करता रहता है, यद्वा-तद्‌वा बोलता रहता है, भक्ष्याभक्ष्य खाता रहता है, वह असंस्कारित कहलाता है ।

>उदाहरण

वह व्यक्ति सुसंगति को प्राप्त कर श्रेष्ठ मानव या कुसंगति को पाकर दुष्ट दानव बन सकता है। कहा भी है-
कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुण तीन।
जैसी संगति बैठिये, तैसो ही फल दीन॥

अर्थ- जिस प्रकार पानी की बूंद स्वाति नक्षत्र के समय सीप में गिरती है तो मोती का रूप धारण कर लेती है, केले के वृक्ष में गिर कर कपूर और सर्प के मुख में गिर कर जहर बन जाती है, उसी प्रकार से बच्चे को जैसी संगति मिलती है वैसे ही उसके आचार-विचार बन जाते हैं । ​

>संगति का फल :

संगति का फल : एक बार एक बहेलिये ने दो तोते पकड़े । उसने उसमें से एक तोते को एक सज्जन, सभ्य, श्रेष्ठ सेठ को भेंट कर दिया एवं दूसरे तोते को किसी कसाई ने खरीद लिया। सेठ के यहाँ पर कभी कोई भी आता तो आइये, पधारिये, विराजिये, आपका स्वागत है, नास्‍ता कीजिए आदि-आदि सभ्यतापूर्ण वचन-व्यवहार होता था। तोता इन बातों को सुन-सुनकर इसी प्रकार के सम्मानसूचक वचन बोलना सीख गया। कसाई के यहाँ हमेशा इसको मारो, इसका पैर काट दो, इसकी गर्दन काटो, ये पापी-दुष्ट कहाँ से आ गया, यह खून इसमें भरो, इस माँस को इसमें डालो आदि असभ्य व्यवहार होता था । तोता इन सब असभ्य, पापात्मक, दुष्टतापूर्ण वचनों को सुन-सुनकर वैसा ही बोलना सीख गया । एक दिन उस नगर का राजा घूमता हुआ सेठ एवं कसाई की गली से निकला | वह सेठ के तोते की बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और कसाई के तोते की बातें सुनकर क्रोधित । उसने क्रोधित होकर तोते को दण्ड देने के लिए उसे राजमहल में बुलवाकर दण्ड की घोषणा की | दण्ड की घोषणा सुनकर मंत्री राजा से कहता है- ““महाराज ! इसमें तोते का कोई दोष नहीं है । दुष्टता का कारण कुसंगति है । यह कसाई के यहाँ रहता है, वहाँ हमेशा इसी प्रकार के शब्द बोले जाते हैं इसलिए यह ऐसा ही सीख गया है, अत: इसको अपराधी नहीं कह सकते हैं।' उपर्युक्त उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि असंस्कारित व्यक्ति जैसी संगति प्राप्त करता है वैसा ही उसका जीवन बनता है, इसलिए बचपन से ही अपने एवं अपने आश्रितजनों को अच्छी संगति में रखकर भविष्य को विकासोन्मुखी बनाना चाहिए।

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