असंस्कार
इसमें न कुसंस्कार होते हैं और न सुसंस्कार अर्थात्‌ जिसमें संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं होती है, वे असंस्कार कहलाते हैं ।
कुसंस्कार
जिन कार्यों से जीवन पतित हो जाता है, उन कार्यों को करने की भावना कुसंस्कार कहलाती है।
सुसंस्कार
1. श्रेष्ठ संस्कारों को सुसंस्कार कहते हैं।
2. जिन कार्यों को करने से स्वयं का एवं दूसरे का हित हो, ऐसे कार्यों को करने की भावना रखना सुसंस्कार है।
3. परोपकार, दया, करुणा, देशहित, पापनिवृत्ति एवं अच्छे कार्यो में प्रवृत्ति होना ही सुसंस्कार है।
पूर्व उपार्जित संस्कार
पूर्व भवों में किये गये कर्मों के फल में प्राप्त "आदतें ' पूर्वोपार्जित संस्कार कहलाते हैं।
पूर्व भवों में किये गये बैर और प्रेम के कारण वर्तमान में उत्पन्न बैर एवं प्रेम के संस्कार अर्थात्‌ सहज रूप से जो बैर तथा प्रेम उत्पन्न होता है, वह पूर्वोपार्जित संस्कार है।
कुल-परंपरागत संस्कार
1. माता-पिता आदि के कुल से आये हुए संस्कार कुल-परम्परागत संस्कार कहलाते हैं ।
2. दादा-परदादा आदि के क्रम से चली आई अच्छी या बुरी आदत को कुल परम्परागत संस्कार कहते हैं।
3. आनुवंशिकता को ही कुल परम्परागत संस्कार कहते हैं।
माता पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार
माता पिता द्वारा दिए गए सीख और आदतों को माता-पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार कहते हैं ।
ये सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है , बच्चे अपने माता पिता की बातों से नहीं बल्कि अपने माता पिता को देख कर ही सीखते हैं
गुरु दत्त संस्कार
गुरु के द्वारा दिए गए संस्कार
संगति से प्राप्त संस्कार
जिस प्रकार पानी को जैसा रंग मिलता है वह उसी रंग में परिवर्तित हो जाता है उसी प्रकार बच्चा भी पानी के समान है । वह जैसी संगति प्राप्त करता है उसी रूप में ढल जाता है ।

Teeka!

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